भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता
इतिहास किसी राष्ट्र और उसके नागरिकों के लिए प्रेरक बल का कार्य करता है. यदि
किसी राष्ट्र का अतीत श्रेष्ठ हो तो वह अपनी आने वाली पीढ़ियों को न सिर्फ
प्रेरित-प्रोत्साहित करता है वरन नागरिकों का आत्मबल भी बढाता है. इस ऐतिहासिक
श्रेष्ठता का भाव आधुनिक समय में अमेरिकी व् ब्रिटिश लोगों में देखा जा सकता है.
जो अपने देशहित में कभी “अमेरिका प्रथम” की नीति अपनाते है या खुद को “ग्रेट
ब्रिटेन” संबोधित करते हैं. जबकि ये देश भारत और चीन की तुलना में अपेक्षाकृत बहुत
नए है. किसी देश के विकास हेतु उस देश के नागरिकों में अपने सांस्कृतिक और
ऐतिहासिक विरासत तथा राजनैतिक मूल्यों में निष्ठा व् विश्वास होना आवश्यक है .इसी
निष्ठा, राष्ट्रीय गौरव और आत्मबल के कारण आज अमेरिका विश्व का सबसे ज्यादा ताकतवर
देश है और जापान सबसे ज्यादा तकनीकी देश, जबकि इन भावों के अभाव में, अपनी तमाम
सांस्कृतिक संवृद्धि और ऐतिहासिक विरासत के बावजूद आज भारत अपना स्थान नहीं
प्राप्त कर सका है. जो देश कभी “विश्व गुरु” और “सोने की चिड़िया” आदि उपाधियों से
नवाजा गया था आज राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए संघर्ष कर रहा है.
किसी राष्ट्र को पराधीन करने के लिए इसके आत्मसम्मान व् आत्मबल को
नष्ट करना जरुरी होता है अन्यथा ताकत के बल पर हासिल की गयी विजय सदैव अल्पकालिक
होती है. और यही कार्य अंग्रेजों ने भारत में शिक्षा के माध्यम से किया. अंग्रेजों
नें भारत में अपनी सत्ता की स्थापना के लिए भारतीय ग्रंथों का सहारा लिया और उनका
अध्ययन किया ताकि शासितों के बारे में जान सकें तथा इन ग्रंथो का सहारा लेकर ये सिद्ध किया जा सके कि भारतीय शुरू से ही विदेशियों
द्वारा शासित रहें है और उनमें राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसी भावना
कभी नहीं रही है. जबकि ये अवधारणा विष्णुपुराण में दिए गए भारत राष्ट्र की अवधारणा
के प्रतिकूल हैं. ब्रिटिश इतिहासकारों ने यही तथ्य अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से
लगभग १०० वर्षों तक भारतीयों के मन मस्तिष्क में प्रतिष्ठापित किया और राष्ट्रीय
चेतना को पनपने नहीं दिया. नस्लीय श्रेष्ठता और पूर्व को हेय दृष्टी से देखने की
उनकी मनोवृत्तियों ने औपनिवेशिक शासन को “ श्वेत जाति के भार “ के अनुरूप
न्यायोचित भी ठहराया.
यही कार्य मार्क्सवादी चेतना के बाद वामपंथी इतिहासकारों द्वारा किया
गया जिन्होंने मार्क्सवाद जैसी असंभावित विचारधरा को मूर्त रूप देने हेतु भारतीय
सांस्कृतिक विरासत व् चेतना को नकारते हुए उसे न सिर्फ हिकारत की दृष्टी से देखा
वरन उसे नष्ट करने का सुनियोजित कार्य भी किया और कार्ल मार्क्स व् लेनिन यहाँ तक
की माओत्से तुंग के आयातित विचारों पर देश को शासित करने का प्रयास किया.
वामपंथियों ने जान बूझकर भारतीय सांस्कृतिक विरासत व् परम्पराओं को “अंधविश्वास और ढोंग पर आधारित” शिद्ध करने का प्रयास किया और
भारतीय इतिहास की प्राचीन उपलब्धियों की
उपेक्षा करते हुए इतिहास का उपयोग आक्रंताओ के महिमामंडन और भारतीयों के मानदर्पन
हेतु किया. सभी वामपंथी इतिहासकार वेद और पुराण को “परीलोक की कथाओं” व् “माइथालोजी”
का दर्जा देते है और प्राचीन भारतीय दार्शनिक परंपरा व् विज्ञानं-गणित की
उपलब्धयों को अनदेखा करते हुए सिर्फ मनु जैसे स्मृतिकारों का उल्लेख अपनी वैचारिक श्रेष्ठता व् भारतीय
संस्कृति को विभेदकारी सिद्ध करने के लिये करते हैं. वामपंथ जिसका आधार ही आर्थिक और श्रेणीगत वैमनस्यता
है और जो समस्त तथाकथित “बुर्जुआ” वर्ग को अपना दुश्मन मानते हुए उन्हें समाप्त कर
“सर्वहारा की तानाशाही” को स्थापित करने की बात करता है, उसके अनुयायी आज लोकतंत्र
की स्थापना व् उसे बचाने का ढोंग करते हैं जबकि नार्थ कोरिया, चीन, क्यूबा और रूस
का उदहारण सबके सामने है जहाँ लिंचिंग आम बात है और जिसके विचारक मानते हैं की
सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है. शासन प्रणालियों का अध्ययन करें तो यह सिद्ध
हो जाता है कि तानाशाही शासन प्रणालियों में कम्युनिष्ट शासन प्रणाली निकृष्टतम है
जहाँ व्यक्ति से ऊपर कम्युनिष्ट तानाशाह, उसका पोलित ब्यूरो और राष्ट्र है और शासन
से किसी भी तरह की असहमति का परिणाम सिर्फ मौत है.
यूरोपीय व् वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास लेखन के माध्यम से न सिर्फ
भारत की राष्ट्रिय व् सांस्कृतिक अस्मिता को तार-तार किया वरन भारतीयों में हीनता
और पराधीनता का भावना को विकसित किया. यही कारण है की वामपंथियों द्वारा लिखित
झूठे-अवैज्ञानिक इतिहास को पढ़कर कुछ भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्र अज्ञानतावश या
राजनितिक कारणों से देश की सांस्कृतिक परम्पराओं और बहुसंख्यको की धार्मिक आस्थाओं
पर चोट करके अपनी छदम आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता को सिद्ध करने का कुप्रयास कर
रहें है. ऐसे लोग देवी दुर्गा की निंदा करते है और महिषासुर को महिमामंडित करने समेत
सभी वैदिक प्रथाओं-परम्पराओं, हिन्दू लोकाचारों और तीज-त्योहारों की सार्वजानिक निंदा
करते रहते है जिससे लोगो की भावनाओ को चोट पहुचती है और ये विचार की अभिव्यक्ति के
नाम पर ये सब करते हैं. जबकि उनकी ये अभिव्यक्ति सिर्फ हिन्दू धर्म से ही सम्बंधित
होती है.
उपनिवेश रहे ज्यादातर देशों ने अपनी आजादी के बाद औपनिवेशिक एतिहासिक
लेखन को हटाकर अपने राष्ट्र के इतिहास का पुनर्लेखन किया और अपने राष्ट्रीय नायको
को इतिहास की पुस्तकों में शामिल करते हुए पराधीनता के प्रतीकों को हटाकर राष्ट्रीय
मूल्यों और गौरव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया, परन्तु भारत में स्वाधीनता
के बाद से ही नेतृत्व पर वामपंथी प्रभाव और छद्म धर्मनिरपेक्षता की भावना के चलते
ये अतिमहत्वपूर्ण कार्य नहीं किया जा सका. वरन राष्ट्रवादी विचारकों को
अन्धविश्वासी, कट्टरपंथी / रूढ़िवादी होने का आरोप लगाकर उनको दमित करने और किनारे
लगाने का संगठित प्रयास किया गया. देश के शिक्षा विभाग व् शिक्षण संस्थाओं में
वामपंथी विचारधारा को पालित-पोषित किया गया और इतिहास के नाम पर राजनितिक हितों के
अनुरूप मनगढंत कहानियों और कुतर्कों पर आधारित इतिहास को पाठ्यपुस्तकों में शामिल
किया गया. वामपंथी इतिहासकारों यथा इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर और आर.एस.शर्मा आदि नें अपने राजनैतिक संरक्षण और वैचारिक पूर्वाग्रहों के कारण भारत के
ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया तथा नए ऐतिहासिक विमर्श स्थापित
किये. इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों नें अपने धार्मिक पूर्वाग्रहों के कारण तुर्क
अफगान और मुग़ल आक्रमणकारियों को न सिर्फ महिमामंडित किया वरन इस इतिहास के माध्यम
से स्वधर्मी लोगों में शासक वर्ग से होने का गैरवाजिब एहसास जगाते हुए उनको सत्ता
का स्वाभाविक हकदार भी बताया. यही तथाकथित तुर्क-मुग़ल श्रेष्ठता के विचार, भारत के
विभाजन और पाकिस्तान और बांग्लादेश के उदय के लिए जिम्मेदार थे और ये परिस्थितियां
कमोवेश आज भी व्याप्त है, जो भारत को एक राष्ट्र के रूप में उदित होने से रोकती
है.
विश्व की प्राचीनतम और जीवंत सभ्यताओं में से एक भारत का वर्तमान
इतिहास, अपने नागरिकों में अपनी सनातन संस्कृति के प्रति आत्मसम्मान, गौरव और
आत्मबल जागृत करने में न केवल असफल रहा है वरन यूरोपीय और वामपंथी इतिहासकारों ने
भारतीयों के मन में सदैव से विदेशियों द्वारा शासित होने और श्रेणीगत भेदभाव पर
आधारित सामाजिक संरचना का हिस्सा होने की हीन
भाव भर दिया है. वर्तमान इतिहास हमें आगे बढ़ने के प्रेरणा नहीं देता, वरन ये हमें
ग्लानी और पराश्रित होने का एहसास कराता है. आज जब पूरा विश्व प्राचीन भारतीय उपलब्धियों
का संज्ञान ले रहा है, भारतीय योग, आयुर्वेद, स्थापत्य कौशल, दर्शन, विज्ञानं और
तकनीकी के क्षेत्र में प्राचीन भारतीयों विद्वानों का लोहा मान रहा है, परन्तु हम
भारतीय खुद को वो स्थान नहीं दे पा रहे हैं जिसका वह सदियों से अधिकारी रहा है. आज
भारतीय इतिहास की किताबों में दक्षिण
भारतीय राजवंशो और पूर्वोत्तर के राजवंशो, विजयनगर और मराठा साम्राज्य के बारे में
जानकारी का आभाव है या फिर इनका उल्लेख कुछ पैराग्राफ या एक-दो अध्यायों में सिमटा
दिया गया है. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति को आज भी व्यापकता से
देखा जा सकता है जिसे दक्षिण भारतीय राजवंशो ने बिना ताकत व्यापार, धर्म और
आध्यात्मिकता से प्रसारित किया. इन देशो में ही दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर अंगकोरवाट
मंदिर, कम्बोडिया में स्थित है परन्तु भारतीय छात्रों को इसके बारे में एक लाइन भी
नहीं पढाया जाता. उन्हें सिर्फ तुर्क मुग़ल और अंग्रेजी शासकों के भारत आगमन और
सत्ता स्थापना, जीत के कारण और उनकी उपलब्धियों के बारे में बताया जाता है और
वर्तमान शासन-प्रशासन, शिक्षा पद्धतियों के लिए औपनिवेशिक शासको को श्री दिया जाता
है. जबकि आवश्यकता इस बात की है कि अन्य देशों की तरह ही प्राचीन काल में हमारे
पूर्वजों ने जो कुछ भी हासिल किया, उसे भारतीय छात्रों को बताया ताकि वो अपनी
संस्कृति पर गर्व कर सकें. वास्तव में भारतीय जहाँ भी गए वहां उन्होंने सकारात्मक
योगदान दिया चाहे वो वेस्ट इंडीज के देशों में गए गिरमिटिया मजदूर हों या दक्षिण-पूर्व
देशों में गए हिन्दू और बौद्ध विचारक. भारतीयों ने बामियान से लेकर बाली द्वीप तक
भारतीय संस्कृति को शांतिपूर्वक तरीके से फैलाया, परन्तु कितने भारतीय इसके बारे
में जानते है.
यही कारण है की आज जब परिस्थितियां बदली है और वामपंथियों का प्रभाव
कम हुआ है. राष्ट्रवादी विचारकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भारत के वास्तविक
गरिमामयी इतिहास को सामने लाये और उसे पाठ्य-पुस्तकों में शामिल कराने का प्रयास
करे. भारत सरकार से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वो भारत की श्रेष्ठ सांस्कृतिक
विरासत को न सिर्फ संरक्षित करे वरन उसको प्रतिष्ठापित और प्रोत्साहित भी करे.
इससे युवा छात्र निश्चित ही अपने सांस्कृतिक विरासत पर गर्व की अनुभूति करेंगे और
राष्ट्रीय निर्माण में योगदान कर सकेंगे तथा कोई भी उनको भ्रमित कर उनका राजनैतिक
लाभ नहीं उठा पायेगा. तभी इतिहास लेखन का सोद्देश्यपूर्ण हो सकेगा.
धन्यवाद...
जय हिन्द . जय भारत.. जय भारतीय संस्कृति...
लेखन :
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य
केंद्रीय विद्यालय राजकोट

Excellent !!!
ReplyDeleteIt is really the need of the hour.
राष्ट्रीय स्वाभिमान एवम संस्कृति के पुनर्जीवन की नितांत आवश्यकता है जो कि इतिहास के गौरव पूर्ण पहलूओं के सही प्रसार से संभव है