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I am a History buff & Principal at Kendriya Vidyalaya Rajkot and serving children, society and nation through Teaching and School Administration. I am a knowledge seeker and working continuously to enhance & update my knowledge by all means. I am a social worker and wishing to serve the people, nation & environment by all possible means.

Saturday, October 12, 2019

सभ्यता और संस्कृति: अर्थ एवं विभेद


सभ्यता और संस्कृति: अर्थ एवं विभेद

इतिहास विषय के अध्ययन में “सभ्यता” और “संस्कृति” शब्दों का प्रयोग प्रायः शिक्षार्थी द्वारा सामान अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है. साधारणतया ये दोनों शब्द पर्यायवाची समझे जाते है, परन्तु अर्थ की दृष्टि से इन दोनों में व्यापक अंतर है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव अपनी ऐहिकऔर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहा है और इस निमित्त वह विविध सामाजिक राजनैतिक संस्थाओ तथा आर्थिक यंत्रो व् साधनों का अन्वेषण करतारहा है ताकिइन  आवश्यकताओं की पूर्ति सरलता सुगमता और विश्वसनीय रूपसे हो सके. इस सभी रचनाओं, संस्थाओं और साधनों की संबद्धता और संस्थागत व्यवस्था का ही नाम है- सभ्यता. इस तरह मनुष्य के ऐहिक और भौतिक विकास के साथ-साथ उसकी सभ्यता का भी विकास होता है. किसी निर्दिष्ट सभ्यता का विकास उस समाज विशेष के भौगोलिक वातावरण, ऐतिहासिक अनुभव, शिक्षण व् तकनीकी उन्नयन पर निर्भर करता है.

परन्तु प्रत्येक सभ्यता के क्रमिक विकास में एक स्तर आता है जब वह विशेष नैतिक, मानसिक एवंआध्यात्मिक आदर्शो का निर्माण कर लेता है जो उसके सामूहिक जीवन में इस प्रकार घुल मिल जाते है की समस्त समाज इन उदात्त और सूक्ष्म विशेषताओं में रंग जाता है. इस प्रकार संस्कृति का तात्पर्य विचारों की क्रियाशीलता व् उसके सौन्दर्य तथा मानवता की अनुभूति से होता है. दुसरे शब्दों में, सत्यऔर सौंदर्य की खोज, अभिव्यक्ति और मानव प्रेम का विकास संस्कृति के मूलतत्व है, अर्थात “सत्यं शिवम् सुन्दरम” ही संस्कृति का मूलमंत्र है. निष्कर्षतः सभ्यता के सूक्ष्म, शुद्ध और उदान्त तत्वों के रचनात्मक विकास और पल्लवन का नाम ही संस्कृति है.

सभ्यता के अंतर्गत उन सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिसके माध्यम से कुछ अन्य उद्देश्यों / लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है. सभी भौतिक वस्तुएं यथा- भवन व् उसका स्वरूप, सिक्के, यातायात के साधन आदि इसके अंतर्गत आती है. सभ्यता के अंतर्गत तकनीकी, प्राकृतिक संक्रियाओं के ऊपर मानवीय प्राधिकार और सामजिक नियमन हेतु निर्मित संस्थायें आती हैं जो मानवीय व् सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करती हैं. जबकि संस्कृति के अंतर्गत धर्म, कला, दर्शन, साहित्य, नृत्य और संगीत आदि आते हैं जो मानव को आनंद और संतुष्टि प्रदान करते हैं. इस तरह संस्कृति जीवन की सर्वोच्च दशा को अभिव्यक्त करती है.

सभ्यता वह है जो हम धारण करते हैं और जिसके मापन का निर्धारित मानदंड होता है. इस तरह सभ्यता का सार्वभौमिक मानक है उपयोगिता और इसलिए सभ्यता स्वयं में एक साधन है, जबकि संस्कृति वह है जो हम मूल रूप से हैं संस्कृति के मापन का कोई निर्धारित मानदंड नहीं है क्योकि वह स्वयं एक साध्य है.

सभ्यता को निरंतर प्रगतिशील कहा जा सकता है क्योंकि सभ्यता के तत्वों- भवन. मशीन, यातायात-संचार के साधनों आदि में निरंतर उन्नयन देखा जा सकता है. जबकि संस्कृति को प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता और ना ही आज की कला साहित्य व् दर्शन आदि को पूर्व की तुलना में श्रेष्ट कहा जा सकता है.

सभी मानव समाज की एक सुनिश्चित संस्कृति होती है जबकि कुछ ही मानव समाज की सभ्यता होती है. संस्कृति  एक प्राक-क्रिया है जबकि सभ्यता एक अंतिम क्रिया है. संस्कृति किसी सभ्यता के विकास की पूर्व शर्त है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के विशिष्ट स्तर को प्रतिरूपित करती है. संस्कृति आंतरिक अनुभूति का विषय है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के वाह्यप्रदर्शन और उपयोगिता का विषय है. इस प्रकार संस्कृति जहाँ मानव के विचारों, भावनाओं, संवेगों, आदर्शों और मूल्यों से सम्बंधित है वहीँ सभ्यता व्यक्ति की भौतिक उपलब्धियों की अभिव्यक्ति एवं उसके अस्तित्व का द्योतक है.

इस तरह किसी सभ्यता विशेष का चित्रण आसान होता है, परन्तु संस्कृति विशेष का वास्तविक बोध तथा विवेचन केवल सुहृदय प्रयास, निष्पक्ष अनुसन्धान और सूक्ष्म चिंतन द्वारा ही संभव है. निष्कर्षतः सभ्यता यदि एक देह है तो संस्कृति उसमे अनुप्राणित आत्मा. जैसे देह का वर्णन आसान है परन्तु आत्मा का दिग्दर्शन कराना कठिन है. इसी प्रकार सभ्यता का वर्णन आसानी से  किया जा सकता है जबकि संस्कृति का वर्णन दु:साध्य है. इस तरह संस्कृति केवल अनुसूचित विवरण का विषय नहीं है उसका अध्ययन तो समग्र देह का एक सूक्ष्म सार मात्र ही है. इतिहास विषय का मौलिक उद्देश्य यही अध्ययन है और संस्कृतियों के उदय, विकास और विनाश की खोज ही इतिहास के विद्यार्थियों का श्रेयस्कर कार्य है.

-इति-

लेखन:
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय राजकोट, गुजरात

Tuesday, October 8, 2019

इतिहासअध्ययन सम्बन्धी भ्रांतियाँ और इतिहास का महत्त्व


इतिहास अध्ययन सम्बन्धी भ्रांतियाँ और इसका महत्व
इतिहास अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है, परन्तु सामान्यतः छात्र इसे व्यर्थ और अनुपयोगी विषय मानते है और इसके अध्ययन को गड़े मुर्दे उखाड़ने जैसे कार्य की संज्ञा देते है.  छात्र इतिहास और एतिहासिक घटनाओं के अध्ययन में तिथियों का अत्यधिक महत्त्व मानते है.  इसी तरह छात्रों में इतिहास को अवधारणा आधारित विषय न मानते हुए इसे तथ्यात्मक और रटंत विद्या मानने की प्रवृति पायी जाती है. साथ ही साथ इतिहास को लोग सामान्यतः एतिहासिक घटनाओ का संग्रह ही मानते है. जबकि यह सब इतिहास विषय सम्बन्धी भ्रान्तिया मात्र ही है और इतिहास विषय की प्रकृति और उसके क्षेत्र के बारे में उनकी अज्ञानता इतिहास विषय की रोचकता औरउसके अध्ययन के वास्तविक लाभ से उनको वंचित रखती है.
वास्तव में इतिहास विषय का अध्ययन हमें हमारी प्राचीन उपलब्धियों से अवगत कराता है किभारत पूर्व में विज्ञान और दर्शन की विभिन्न विधाओं में अग्रणी था और उसे विश्व-गुरु का दर्जा प्राप्त था. भारतीय मलमल, सूती रेशमी और ज़री के कपडे और इस्पाती तलवारों की मांग सम्पूर्ण विश्व में थी तथा विदेशी निर्यात से आने वाले अकूत धन के कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. इस तरह हमारे गौरवपूर्ण अतीत का अध्ययन हमें सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. यह हमें प्रेरित करता है की यदि अतीत में भारत विश्व का पथ-प्रदर्शक बन पाया था तो आज के विश्व में यह सकारात्मक भूमिकानहीं निभा पायेगा, इसका कोई कारण नहीं है. विष्णु पुराण में भारत भूमि की गौरव-गाथा एवं उसके विस्तार का वर्णन मिलता है. जिससे राष्ट्रके नागरिकों में. सह-अस्तित्व, विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होता है.
इतिहास का अध्ययन न सिर्फ अतीत में हमारी रूचि जागृत करता है वरन ज्ञान का श्रोत भी उपलब्ध कराता है. यह हमें अपनी सीमाओं की रक्षा की अनदेखी के खतरों से आगाह कराता है. ये हमें बताता है की वे मूर्खतायें नहीं करनी चाहिए, जिनके दुष्परिणामों को हम अतीत में भुगत चुके है. इस प्रकार इतिहास हमारा मार्गदर्शन करता है और आज का समाज अतीत के अनुभवों से व्यापक लाभ उठा सकता है.
इतिहास को एक अध्ययन के विषय के रूप में समस्त विषयों की जननी कहा जाता है. जहां अन्य विषयों के अध्ययन के आरम्भ का काल सुनिश्चित किया जा सकता है, वहीं इतिहास का अध्ययन शिक्षा के आरंभिक काल से ही हो रहा है तथा अन्य विषय इतिहास से ही उदभूत है. इतिहास के अध्ययन से हमें. अनेक आधुनिक भाषाओं और लिपियों के विकास की जानकारी मिलती है. इतिहास के क्रमागत अध्ययन से ही स्पष्ट है कि प्रायः सभी उत्तर भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुयी है.
इतिहास मानविकी विषय का अंग होने के कारणव्यक्ति में मानवीय और सामाजिक गुणों का विकास करता है तथा व्यक्ति का समाज और वाह्य संसार से तादात्म्य एवं समायोजन करता है. इतिहास के अध्ययन से हमें उन शक्तियों कापता चलता है जिन्होंने भारतीय समाज को एक सांचे में ढ़ालकर आज की स्थिति में पहुँचाया और इससे हमेंअपने वर्तमान को समझने और भविष्य को संवारने के लिए भी मार्गदर्शन प्राप्त होता है.
इतिहास के अध्ययन से हमें नैतिक शिक्षा भी मिलती है. विभिन्न एतिहासिक ग्रंथो में वर्णित घटनाओं से स्पष्ट होता है की  शासक जब अधर्म के पथ पर चलते है तो उनका विनाश होता है और अंततः धर्म की विजय होती है. महाकाव्यों, वेदों और वेदांगो में वर्णित सूक्ति-वाक्य हमेंसदैव प्रेरणा, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन देते है ताकि हम सदैव न्याय का अनुशरण कर सकें.
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण इतिहास का अध्ययन इसका रोजगारपरक होना है. इतिहास का अध्ययन हमारे सामान्य ज्ञान को संवर्धित करता है. इससे जहाँ हम रोजगारपरक प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सरकारी व् गैर-सरकारी सेवाओं में जा सकते है वहीं अंतर्राष्ट्रीय संबंधो के निर्धारण में भी इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बिना एतिहासिक ज्ञान के वैदेशिक संबंधो का संचालन सुगमता से नहीं किया जा सकता. एक विदेश सेवा के अधिकारी के लिए इतिहास विषय का ज्ञान अपरिहार्य है बिना इसके  राष्ट्र की विदेश नीति सफल नहीं हो सकती. इतिहास का ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण और उसका परिष्कार करता है. इतिहास के ज्ञानार्जन से जहाँ सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है वहीँ विभिन्न प्रश्नोत्तरी आधारित कार्यक्रमों जैसे- कौन बनेगा करोड़पति आदि में शामिल होकर या प्रतिभागियों का सहयोग कर धनार्जन और यश की प्राप्ति की जा सकती है.
लेखन:
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय राजकोट, गुजरात