भारत
के सन्दर्भ में राष्ट्र और नागरिकता की अवधारणा
‘नागरिक’ शब्द का प्रयोग हमेशा लोकतान्त्रिक देशों के सन्दर्भ में ही
होता है, लोकतान्त्रिक देशों में नागरिक और सरकारें दोनों अपने अधिकार और
उत्तरदायित्व संविधान से प्राप्त करती है. जबकि गैर लोक-तांत्रिक देशों में रहने
वाली जनता प्रजातुल्य होती है जिसको कोई भी वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होता और
शासक ही संप्रभु होता है. नागरिकता का प्रश्न उतना ही पुराना है जितना
लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का. किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए नागरिक का
महत्त्व बहुत होता है अगर राष्ट्र देह है तो नागरिक उसकी आत्मा. दोनों एक दूसरे के
पूरक है और अनिवार्य अंग भी. दोनों सहयोगी है और सहचर भी. लोकतान्त्रिक सरकार का
उद्देश्य इन दोनों तत्वों यथा नागरिक और राष्ट्र को एकीकृत रखना और इनके सम्मिलित
विकास के प्रयास करना. लोकतान्त्रिक सरकारें प्रायः यही करने का प्रयास करती है
मगर उनका चुनाव नागरिकों के वोट से बहुमत
के आधार पर ही होता है और सबको खुश रखना प्रायः संभव नहीं होता, अतः वे नागरिकों
को अलग समूहों में बांटने और बहुमत का सहयोग प्राप्त करने के लिए सब कुछ करती है
ताकि उनका अस्तित्व बना रहे और उनकी रोजी रोटी भी चलती रहे. इस तरह से
लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली भी “बांटो और राज करो” की पुरानी रोमन नीति पर ही
आधारित हो जाती है और अपने उद्देश्यों से भटक जाती है अतः सफल लोकतान्त्रिक देश के
लिये नागरिकों का शिक्षित, जागरूक और और सक्रिय रहना जरूरी होता है अन्यथा इसके अभाव
में सत्ता अनियंत्रित अप्रभावी और विभेद्कारी हो जाती है और ये स्थिति किसी भी
राष्ट्र के लिए हानिकारक होती है.
राष्ट्र शब्द का अर्थ अलग अलग विद्वान अलग अलग लगाते हैं. कुछ लोगों
का मानना है कि राष्ट्र का तात्पर्य किसी भूक्षेत्र के अधीन रहने वाले लोगों से है
जिसके अंतर्गत ‘लोग’ महत्वपूर्ण है जबकि कुछ का मानना है कि राष्ट्र का तात्पर्य ‘आबाद
व निर्धारित भूक्षेत्र’ से है जिसमे आबादी से ज्यादा भूक्षेत्र महत्वपूर्ण है. यह
एक निष्कर्ष विहीन विमर्श है, परन्तु यह सर्वमान्य है कि राष्ट्र के अंतर्गत एक
समान संस्कृति व् इतिहास सब लोगों के द्वारा साझा की जाती है. प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती
है और ये संस्कृति कई उप संस्कृतियों के सम्मिलन से बनती है जो क्षेत्रीय, भाषाई और भौगोलिक बिभिन्न्ताओं
के कारण अलग अलग क्षेत्रों में कुछ नवीनता और भिन्नता लिए पनपती है, परन्तु ये उप
संस्कृतियाँ मूल संस्कृति की छाया में ही रहती है और मूल संस्कृति के साथ साथ ही पल्लवित पुष्पित
भी होती है. इस तरह संस्कृतियो में लगातार समन्वय होता रहता है और दीर्घ (मूल) तथा
लघु (क्षेत्रीय) परम्पराओं के समामिलन से भी संस्कृति समृद्ध होती रहती है.
किसी राष्ट्र के अंतर्गत उसकी विभिन्न उप संस्कृतियों में निरंतर संपर्क और
उनकी अंतर्क्रिया से न सिर्फ उनमें क्षेत्रीय संवाद तथा पारस्परिक निर्भरता बढती
है वरन राष्ट्र की एकता भी बढती है. परन्तु दो सर्वथा विविध संस्कृतियों के मध्य ऐसा
सम्मिलन असंभव होता है और उनमे प्रारम्भ से ही संघर्ष के लक्षण दिखाई देते है , क्योकि
दो विविध परम्परायें के मूल तत्त्व असमान
होने के कारण इनमें श्रेष्ठता को लेकर विवाद बना रहता है और ऐसी दो सर्वथा विपरीत
संस्कृतियों के मध्य संघर्ष कोई नई बात
नहीं है यह सभ्यता के आरम्भ से ही दृश्यमान है. यह सार्वभौमिक तथ्य है कि धर्म और
संस्कृतियों के बदलने से आस्थायें और निष्ठायें भी बदल जाती है. अतः समान संस्कृति
और उप-संस्कृतियो वाले लोगो से जहाँ राष्ट्र मजबूत होता है वहीँ मिली जुली
संस्कृतियो वाले राष्ट्रों में सरकारें प्रायः राष्ट्रीय एकता की छदम स्थापना में
ही लगी रहती है और इसके लिए असफल प्रयास करती रहती है. दुनिया के सभी ईसाई मुस्लिम
और यहूदी क्रमशः अपनी आस्था रोम मक्का-मदीना और यरुशलम में रखते है, जो स्वाभाविक
है परन्तु किसी भी साम्प्रदायिक संघर्ष की स्थिति में इनमें
से बहुतायत के द्वारा अपने धर्म और इसकी
उत्पत्ति वाले देश के साथ सहानुभूति रखा ही जायेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसी
स्थिति बहुराष्ट्रीयतावाद को जनम देती है अतः दीर्घकालीन व् स्थायी राष्ट्रीय शांति के
लिए किसी भी राष्ट्र को समान संस्कृति वाले लोगों को नागरिकता देने में प्राथमिकता
दिए जाने का अधिकार होना चाहिए. इसलिए भारत में भी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में
आस्था रखने वाले और पाकिस्तान बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुसंख्यक
देशों में रह रहे धार्मिक उत्पीडन के शिकार हिन्दू बौद्ध जैन और सिख अल्पसंख्यकों को ही नागरिकता
दी जानी चाहिए ना कि आर्थिक अवसरों की तलाश में आये गैर सांस्कृतिक लोगो को मानवीयता के
आधार पर. यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के
कानूनों के तहत अपरिहार्य होने पर ही ऐसे लोगो को अल्पकालिक वीसा दिया जा सकता है
परन्तु नागरिकता किसी भी दशा में नहीं, विशेषकर जब देश के नागरिक ही संसाधनों की
कमी का सामना कर रहे हों.
संस्कृति किसी राष्ट्र की पहचान होती है और प्रत्येक राष्ट्र इसे
सहेजता और संजोता है. दुनिया के सभी धर्म जिनकी उत्पत्ति जहा हुयी वे वहाँ संरक्षित
किये जा रहे है फिर चाहे वो इस्लाम हो या ईसाई, इनके जन्मस्थान आज संरक्षित भी है
और सुरक्षित भी. जहाँ से इनको प्रचारित और प्रसारित भी किया जा रहा है. परन्तु
भारतीय पंथों को हमेशा से विदेशी सक्तियों की आक्रामकता का सामना करना पड़ा है .
धर्म के आधार पर देश के विभाजन के बावजूद भी आज ये धर्म और इनके धर्मावलम्बी अपनी शांतिप्रियता और उदारता के कारण संकटों का
सामना कर रहे है. सनातन वैदिक हिन्दू धर्म, बौद्ध, जैन और सिख धर्म आज अपनी ही
भूमि पर संरक्षित व् सुरक्षित नहीं है. भले ही हमने राजनीतिक कारणों या कुछ अन्य कारणों से धर्मनिरपेक्षता को अपने संविधान
में संशोधन द्वारा डाल दिया हो, परन्तु भारत आज भी अपनी भारतीय संस्कृति के कारण
ही जाना व् पहचाना जाता है. एक भारतीय होने के नाते ये हमारा दायित्व है कि हम
अपनी सनातन पहचान को न सिर्फ बनाये रखे वरन इसे हर जरुरी प्रयासों से संरक्षित-
संवर्धित भी करें. अगर दुनिया के किसी भी देश में अपनी भारतीय संस्कृति के कारण
कोई व्यक्ति सताया जाता है तो यह भारत देश का दायित्व है की वह उस का संरक्षण करे
और आवश्यक होने पर उसे देश की नागरिकता भी प्रदान करे. अन्यथा ये भारतीय संस्कृति
को मानने वाले कहा जायेंगे. भारत ने जब अपनी मातृभूमि से भगाए गए यहूदी और
पारसियों को शरण दी है तो भारतीय धर्मों को मानने वालों का यह नैसर्गिक अधिकार है
कि वह धार्मिक उत्पीडन की दशा में अपने सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके और खुद को सुरक्षित-संरक्षित
महसूस कर सके. इस सन्दर्भ में नागरिक संशोधन कानून -२०१९ सर्वथा सही कदम है जो न
सिर्फ भारतियों द्वारा अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का एक प्रभावी कदम है वरन
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना का भी. ध्यान रहे कि जो देश अपनी संस्कृति को
उपेक्षित और तिरस्कृत करता है वो अपनी पहचान खो देता है और आत्म सम्मान भी. धर्म
संस्कृति का एक प्रमुख तत्व है और ये मानव व्यवहार को निर्देशित व् नियंत्रित भी
करता है जो लोग नास्तिक है वे भी नास्तिकता की विचारधारा से संचालित व् प्रेरित
होते है. अतः धर्म के प्रभाव से कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक.
स्पष्टतया धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा एक छद्म अवधारणा है.
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लेखन : -
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्यकेंद्रीय विद्यालय राजकोट
(प्रस्तुत विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं जो सिर्फ साहित्यिक विमर्श हेतु है और पाठक इससे असहमति का पूरा अधिकार रखते हैं.)
