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I am a History buff & Principal at Kendriya Vidyalaya Rajkot and serving children, society and nation through Teaching and School Administration. I am a knowledge seeker and working continuously to enhance & update my knowledge by all means. I am a social worker and wishing to serve the people, nation & environment by all possible means.

Sunday, December 15, 2019

भारत के सन्दर्भ में राष्ट्र और नागरिकता की अवधारणा


भारत के सन्दर्भ में राष्ट्र और नागरिकता की अवधारणा

       ‘नागरिक’ शब्द का प्रयोग हमेशा लोकतान्त्रिक देशों के सन्दर्भ में ही होता है, लोकतान्त्रिक देशों में नागरिक और सरकारें दोनों अपने अधिकार और उत्तरदायित्व संविधान से प्राप्त करती है. जबकि गैर लोक-तांत्रिक देशों में रहने वाली जनता प्रजातुल्य होती है जिसको कोई भी वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होता और शासक ही संप्रभु होता है. नागरिकता का प्रश्न उतना ही पुराना है जितना लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का. किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए नागरिक का महत्त्व बहुत होता है अगर राष्ट्र देह है तो नागरिक उसकी आत्मा. दोनों एक दूसरे के पूरक है और अनिवार्य अंग भी. दोनों सहयोगी है और सहचर भी. लोकतान्त्रिक सरकार का उद्देश्य इन दोनों तत्वों यथा नागरिक और राष्ट्र को एकीकृत रखना और इनके सम्मिलित विकास के प्रयास करना. लोकतान्त्रिक सरकारें प्रायः यही करने का प्रयास करती है मगर उनका चुनाव नागरिकों के वोट से  बहुमत के आधार पर ही होता है और सबको खुश रखना प्रायः संभव नहीं होता, अतः वे नागरिकों को अलग समूहों में बांटने और बहुमत का सहयोग प्राप्त करने के लिए सब कुछ करती है ताकि उनका अस्तित्व बना रहे और उनकी रोजी रोटी भी चलती रहे. इस तरह से लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली भी “बांटो और राज करो” की पुरानी रोमन नीति पर ही आधारित हो जाती है और अपने उद्देश्यों से भटक जाती है अतः सफल लोकतान्त्रिक देश के लिये नागरिकों का शिक्षित, जागरूक और और सक्रिय रहना जरूरी होता है अन्यथा इसके अभाव में सत्ता अनियंत्रित अप्रभावी और विभेद्कारी हो जाती है और ये स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए हानिकारक होती है.

          राष्ट्र शब्द का अर्थ अलग अलग विद्वान अलग अलग लगाते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि राष्ट्र का तात्पर्य किसी भूक्षेत्र के अधीन रहने वाले लोगों से है जिसके अंतर्गत ‘लोग’ महत्वपूर्ण है जबकि कुछ का मानना है कि राष्ट्र का तात्पर्य ‘आबाद व निर्धारित भूक्षेत्र’ से है जिसमे आबादी से ज्यादा भूक्षेत्र महत्वपूर्ण है. यह एक निष्कर्ष विहीन विमर्श है, परन्तु यह सर्वमान्य है कि राष्ट्र के अंतर्गत एक समान संस्कृति व् इतिहास सब लोगों के द्वारा साझा की जाती है.  प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है और ये संस्कृति कई उप संस्कृतियों के सम्मिलन से बनती है  जो क्षेत्रीय, भाषाई और भौगोलिक बिभिन्न्ताओं के कारण अलग अलग क्षेत्रों में कुछ नवीनता और भिन्नता लिए पनपती है, परन्तु ये उप संस्कृतियाँ मूल संस्कृति की छाया में ही रहती है  और मूल संस्कृति के साथ साथ ही पल्लवित पुष्पित भी होती है. इस तरह संस्कृतियो में लगातार समन्वय होता रहता है और दीर्घ (मूल) तथा लघु (क्षेत्रीय) परम्पराओं के समामिलन से भी संस्कृति समृद्ध होती रहती है.

        किसी राष्ट्र के अंतर्गत उसकी  विभिन्न उप संस्कृतियों में निरंतर संपर्क और उनकी अंतर्क्रिया से न सिर्फ उनमें क्षेत्रीय संवाद तथा पारस्परिक निर्भरता बढती है वरन राष्ट्र की एकता भी बढती है. परन्तु दो सर्वथा विविध संस्कृतियों के मध्य ऐसा सम्मिलन असंभव होता है और उनमे प्रारम्भ से ही संघर्ष के लक्षण दिखाई देते है , क्योकि दो विविध परम्परायें  के मूल तत्त्व असमान होने के कारण इनमें श्रेष्ठता को लेकर विवाद बना रहता है और ऐसी दो सर्वथा विपरीत संस्कृतियों के मध्य  संघर्ष कोई नई बात नहीं है यह सभ्यता के आरम्भ से ही दृश्यमान है. यह सार्वभौमिक तथ्य है कि धर्म और संस्कृतियों के बदलने से आस्थायें और निष्ठायें भी बदल जाती है. अतः समान संस्कृति और उप-संस्कृतियो वाले लोगो से जहाँ राष्ट्र मजबूत होता है वहीँ मिली जुली संस्कृतियो वाले राष्ट्रों में सरकारें प्रायः राष्ट्रीय एकता की छदम स्थापना में ही लगी रहती है और इसके लिए असफल प्रयास करती रहती है. दुनिया के सभी ईसाई मुस्लिम और यहूदी क्रमशः अपनी आस्था रोम मक्का-मदीना और यरुशलम में रखते है, जो स्वाभाविक है  परन्तु  किसी भी साम्प्रदायिक संघर्ष की स्थिति में इनमें से बहुतायत के  द्वारा अपने धर्म और इसकी उत्पत्ति वाले देश के साथ सहानुभूति रखा ही जायेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसी स्थिति बहुराष्ट्रीयतावाद को जनम देती है  अतः दीर्घकालीन व् स्थायी राष्ट्रीय शांति के लिए किसी भी राष्ट्र को समान संस्कृति वाले लोगों को नागरिकता देने में प्राथमिकता दिए जाने का अधिकार होना चाहिए. इसलिए भारत में भी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में आस्था रखने वाले और पाकिस्तान बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में रह रहे धार्मिक उत्पीडन के शिकार हिन्दू  बौद्ध जैन और सिख अल्पसंख्यकों को ही नागरिकता दी जानी चाहिए ना कि आर्थिक अवसरों की तलाश  में आये गैर सांस्कृतिक लोगो को मानवीयता के आधार पर. यद्यपि संयुक्त राष्ट्र  के कानूनों के तहत अपरिहार्य होने पर ही ऐसे लोगो को अल्पकालिक वीसा दिया जा सकता है परन्तु नागरिकता किसी भी दशा में नहीं, विशेषकर जब देश के नागरिक ही संसाधनों की कमी का सामना कर रहे हों.

           संस्कृति किसी राष्ट्र की पहचान होती है और प्रत्येक राष्ट्र इसे सहेजता और संजोता है. दुनिया के सभी धर्म जिनकी उत्पत्ति जहा हुयी वे वहाँ संरक्षित किये जा रहे है फिर चाहे वो इस्लाम हो या ईसाई, इनके जन्मस्थान आज संरक्षित भी है और सुरक्षित भी. जहाँ से इनको प्रचारित और प्रसारित भी किया जा रहा है. परन्तु भारतीय पंथों को हमेशा से विदेशी सक्तियों की आक्रामकता का सामना करना पड़ा है . धर्म के आधार पर देश के विभाजन के बावजूद भी आज ये धर्म और इनके  धर्मावलम्बी अपनी शांतिप्रियता और उदारता के कारण संकटों का सामना कर रहे है. सनातन वैदिक हिन्दू धर्म, बौद्ध, जैन और सिख धर्म आज अपनी ही भूमि पर संरक्षित व् सुरक्षित नहीं है. भले ही हमने राजनीतिक कारणों या कुछ  अन्य कारणों से धर्मनिरपेक्षता को अपने संविधान में संशोधन द्वारा डाल दिया हो, परन्तु भारत आज भी अपनी भारतीय संस्कृति के कारण ही जाना व् पहचाना जाता है. एक भारतीय होने के नाते ये हमारा दायित्व है कि हम अपनी सनातन पहचान को न सिर्फ बनाये रखे वरन इसे हर जरुरी प्रयासों से संरक्षित- संवर्धित भी करें. अगर दुनिया के किसी भी देश में अपनी भारतीय संस्कृति के कारण कोई व्यक्ति सताया जाता है तो यह भारत देश का दायित्व है की वह उस का संरक्षण करे और आवश्यक होने पर उसे देश की नागरिकता भी प्रदान करे. अन्यथा ये भारतीय संस्कृति को मानने वाले कहा जायेंगे. भारत ने जब अपनी मातृभूमि से भगाए गए यहूदी और पारसियों को शरण दी है तो भारतीय धर्मों को मानने वालों का यह नैसर्गिक अधिकार है कि वह धार्मिक उत्पीडन की दशा में अपने सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके और खुद को सुरक्षित-संरक्षित महसूस कर सके. इस सन्दर्भ में नागरिक संशोधन कानून -२०१९ सर्वथा सही कदम है जो न सिर्फ भारतियों द्वारा अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का एक प्रभावी कदम है वरन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना का भी. ध्यान रहे कि जो देश अपनी संस्कृति को उपेक्षित और तिरस्कृत करता है वो अपनी पहचान खो देता है और आत्म सम्मान भी. धर्म संस्कृति का एक प्रमुख तत्व है और ये मानव व्यवहार को निर्देशित व् नियंत्रित भी करता है जो लोग नास्तिक है वे भी नास्तिकता की विचारधारा से संचालित व् प्रेरित होते है. अतः धर्म के प्रभाव से कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक. स्पष्टतया धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा एक  छद्म अवधारणा है.
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लेखन : -
अम्बरीश कुमार गुप्ता 
प्राचार्य
केंद्रीय विद्यालय राजकोट
(प्रस्तुत विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं जो सिर्फ साहित्यिक विमर्श हेतु है और पाठक इससे असहमति का पूरा अधिकार रखते हैं.)

Sunday, November 24, 2019

इतिहास लेखन का भारतीय दृष्टिकोण



इतिहास लेखन का भारतीय दृष्टिकोण

इतिहास हमेशा ही विजेताओ द्वारा लिखा जाता है.क्योकि वे ही कुछ विशिष्ट और असामान्य करते है जिसको रिकार्ड करने की जरुरत होती है, ये इसलिए भी जरुरी होता है ताकि विजेता अपने प्रयासों को सही ठहरा सकें, अन्यथा सामान्य घटनाओ के लेखन की क्या आवश्यकता है. अतः राजनितिक आवश्यकताओं के कारण ही इतिहास का एक विशिष्ट विषय के रूप में लेखन शुरू हुआ माना जाता है.

राजनीति असमानता पर आधारित होती है तथा इसी से वह पल्लवित और पुष्पित होती है अतः राजनीति लोक और राष्ट्र को जोडती कम तोडती ज्यादा है जबकि समाज अर्थ और संस्कृति इनको जोडने का कार्य करती है, भारत और भारतीय मनीषी सदैव समावेशी विचारों से प्रेरित रहे है इसलिये भारत में इतिहास लेखन का दृष्टिकोण हमेशा गैर राजनैतिक रहा है तथा इसके लेखन में. सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों को  ही प्रमुखता दी गयी है. ताकि आने वाली पीढ़ियों को सत्य-असत्य और धर्म-अधर्म का ज्ञान दिया जा सके और लोगो को अंततः सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया जा सके. इस दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास लेखन की प्रकृति हमेशा समावेशी और मार्गदर्शी रही है तथा इसको अलग से लिखने का प्रयास कभी भी नहीं किया गया है. भारतीय वेद और पुराण इसके उदाहरण हैं. जहाँ वेद विश्व के प्राचीनतम ज्ञानकोष है वही पुराण प्राचीन आख्यान, जो मूलतः शैक्षिक उद्देश्यों से ही लिखे गए थे. अतः इसमें निरंतरता और क्रम्बध्धता के बजाय नैतिकता सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर अत्यधिक बल दिया गया है.
भारत की एक राष्ट्र के रूप में अभिव्यक्ति प्राचीनकाल से ही रही है जिसकी भौगोलिक सीमा के बारे में स्पष्ट उल्लेख विष्णु पुराण में मिलता है. इस समय यातायात और संचार के साधन अत्यन्त सीमित और नगण्य थे और यह राजनितिक रूप से एकीकृत भी नहीं था, तथापि भारत एक राष्ट्र के रूप में प्राचीन काल से ही विदित रहा है तो इसका एकमात्र कारण भारत की सांस्कृतिक एकता ही रही है. अतः भारतीय ग्रंथो का आधार सदैव से सांस्कृतिक रहा है जिसमे राजनितिक घटनाओ का भी  यत्र-तत्र विवरण मिलता है. इसका यह कतई अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि भारतीयों में एतिहासिक दृष्टिकोण का अभाव रहा है बल्कि इसका तात्पर्य यह है की भारतीय मनीषी राजनीति से ज्यादा मानव और समाज के सांस्कृतिक और नैतिक पहलू पर ज्यादा जोर देते थे और उनका दृष्टिकोण सदैव एक आदर्श  लोककल्यान्कारी राज्य की स्थापना और बंधुत्व के विचारों से प्रेरित रहा है. इसी कारण भारतीय इतिहास अनेक श्रेष्ठ राजाओं यथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, दानवीर हर्षवर्धन, महाराजा विक्रमादित्य आदि आदर्शों और राम-राज्य जैसी अवधारणाओं से परिपूर्ण है.

भारतीय समाज सदा से समावेशी रहा है अतः उसकी शिक्षा प्रणाली भी समावेशी और एकीकृत रही है जिसमे अंतरविषयी ज्ञान को महत्त्व दिया गया था. गुरुकुल प्रणाली सर्व समवेशिक प्रणाली का सर्वोत्तम उदहारण है. जैसे जैसे लोगो ने विशिष्टीकरण की ओर ध्यान दिया और ज्ञान को विभिन्न शाखाओं में बाँटना शुरू किया, प्राचीन शिक्षा प्रणाली की एकीकृत और समावेशी सोच का स्थान तर्क और बुध्ही आधारित नव गैर भारतीय शिक्षा प्रणालियों नेलेना शुरू किया, जिसमे घटना के पीछे के तथ्य और निहितार्थ खोजे जाने लगे और घटनाओं के पीछे के प्रेरक मानवीय मूल्य तथा इससे सम्बध्ह भावनाए गौड़ होने लगी. आदर्शवाद की जगह व्यक्तिवाद और संसारिकता प्रभावी होने लगी. शिक्षा और शिक्षा-प्रणाली व्यव्सयिक होने लगी तथा विषय और उनके अध्ययन के उद्देश्य बदल गए. इतिहास लेखन भी इससे अछूता नहीं रहा.

प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन के विपरीत अब प्रशस्तिया और इतिवृत्त लिखे जाने लगे. जो कार्य पहले मनीषियों द्वारा समाज के उद्देश्य से स्वत: किया जाता था  वही कार्य अब दरबारी चाटुकारों द्वारा निहित स्वार्थ के कारण कारण किया और करवाया जाने लगा. मध्यकालीन अरब और ईरानी लेखकों ने इसी को वास्तविक इतिहास की संज्ञा दी और औपनिवेशिक विद्वानों ने श्रेष्ठता की नस्लीय विचारधारा से प्रेरित होकर तथा अपने औपनिवेशिक शासन का औचित्य शिद्ध करने के लिए भारत को एक बहुराष्ट्रीयता वाले देश के रूप में देखना शुरू किया जो अपनी अक्षमता और अज्ञानता के कारण सदियों से विदेशियों का गुलाम रहा  है.  इन  इतिहासकारों ने सदियों से भारतीयों में एतिहासिक समझ न होने का प्रपंच रचा, जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी वैचरिक सोच के कारण सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया जिसमे वो अधिकतर सफल भी रहे. चूँकि वामपंथियों के आदर्श मार्क्स और लेनिन जैसे विदेशी थे जो औद्योगीकारण की बुराइयो के कारण अस्तित्व में आये थे  इसलिए उन्होंने भारत को भी विदेशियों के चश्में से देखा और प्रत्येक घटना के पीछे सिर्फ अर्थ और आर्थिक शोषण को ही जिम्मेदार माना. इन इतिहासकारों ने  भारत की सभी वर्तमान बुराइयो के लिए भारतीय संस्कृति को दोषी ठहराया और चिकित्सा, ज्ञान-विज्ञान आदि के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय समृद्ध विरासत को न सिर्फ नकारा वरन इसे हेय दृष्टि से देखा और इसको कपोल कल्पित और अवैज्ञानिक बताकर  जान बुझकर लोगो के ध्यान से दूर रखा, फलतः भारतीयों में हीनता की भावना भरने लगी और वे अपनी सामुदायिक समावेशी संस्कृति और एकीकृत राष्ट्र की अवधारणा से दूर होते गए. उनमे आत्म सम्मान और राष्ट्र चेतना का भाव समाप्त होने लगा.

पराधीनता की इस स्थिति को स्वतंत्रता के बाद भी राजनितिक हितो के कारण बनाये रखा गया है और हम आज भी मैकाले की शिक्षा पद्धति के द्वारा लोगो को मानसिक  व् शारीरिक गुलामी करने के लिए तैयार कर रहे है जिनमे स्वावलंबन और आत्म-निर्भरता का अभाव है और वो खुद को सिर्फ नौकरियों के लिए ही तैयार कर रहे हैं. आज की शिक्षा प्रणाली हमें तार्किक और बुद्धिमान तो बना रही है पर ये हमें सामाजिकता मानवीयता परमार्थ और विश्व कल्याण के मार्ग से दूर भी कर रही है. ग्रामीण क्षेत्रों का अनपढ़ व्यक्ति शहरों के पढ़े लिखे वर्ग से ज्यादा संतोषी, सामजिक और दूसरों के सुख दुःख में काम आने वाला होता है. कहने का तात्पर्य है की आज की शिक्षा प्रणाली हमें नितांत व्यक्तिगत और स्वकेंद्रित बना रही है. आज की शिक्षा हमें जीवन यापन के लिए तो तैयार कर रही है पर यह व्यक्ति के अंत: और वाह्य व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित कर पाने में असमर्थ है. अतः आज समग्र समावेशी अंतरविषयी प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को पुनः अपनाने की आवश्यकता है जो बुध्धि ज्ञान कौशल सबका समुचित विकास करती है  न कि पश्चिमी शिक्षा प्रणाली का अन्धानुकरण करने की. उम्मीद है कि देश की नई शिक्षा नीति शिक्षा के वास्तविक मर्म को समझते हुए, भारत की पारम्परिक शिक्षा प्रणालियों और उसकी विरासत को समेटे हुए होगी जिसमें पारम्परिकता के साथ आधुनिकता का भी तालमेल होगा और जो राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ  भारतीयों के नैतिक बल को भी प्रोत्साहित करेगी.

धन्यवाद.

लेखन :
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य
केंद्रीय विद्यालय राजकोट

Sunday, November 10, 2019

How to Study History? (For teachers and Students)


How to Study History?

There has been misunderstanding and misconceptions about History as a subject among most of the students and a few teachers as well, which causes disinterest and boredom in study of History by most of the students. Whereas the importance of History has been unquestioned in world of scholars. History not only tells us who we are, but also understand the world and its cultures. History helps us understanding changes and judge things wisely. History is interesting and make peoples awakened. it helps us in taking right decisions and it is believed that those who don’t learn from history are doomed to repeat it.
History teachers can guide/instruct our students the right ways of studying History and help them in developing conceptual study of history. They can make History interesting for students by suggesting following principles to adopt-
1.      Students should be informed the importance of Studying History in Human Life.
2.      Make a personal connection with students and share your sources with them. They should be informed about good books of history to develop broader understanding of subject.
3.      Don’t forget to summarise chapters/portions you taught and introduce the unexpected.
4.      Students should be told to build a Study Schedule and develop a learning inventory.
5.      Divide the content materials of history into manageable chunks/portions/chapters.
6.      Students should be told to adopt “ Read-Underline-Note-Repeat ” formula for better learning/understanding of History.
7.      Historical events and personalities must be correlated and compared in terms of their impacts over society, polity and economy to develop logical sense and understanding among students and encourage learning life lessons from history.
8.      They should be told to make a list of important historical terms, concepts & Ideas and practice it.
9.      Instruct them to use Maps and Historical Atlases. Learning History through textbooks only can be confusing.
10.  Make use of Mind maps, charts and Maps/Graphs.
11.  They should be motivated to teach a friend or friends for Peer Learning  and work on creative history projects together.
12.  Travel to Historical Places, Museums, Art Galleries & Cultural Centres.
13.  Watch Historical Movies and Documentaries together.
14.  Watching websites of Museums and History Institutions and YouTube for Historical contents be useful.
15.  Tell them to read inspiring Autobiographies and Biographies.
16. Dedicated use of Library: a corner/shelf for the subject can be developed for targeted students and history lovers. Reading 1-2 history books can be given as Holiday Homework/ Vacation Assignment to students.
17. Use of Mnemonics (A word, sentence or poem used to help remember a series of name, rule etc.) help remembering events, names etc. in chronological sequence.
18.  History should be studied in large frame not in small pictures as all historical events are interconnected & outcome of ‘’ Causes and Effects” of previous events.
19.  Be humble about randomness and weird circumstances in history, but understand that everything can’t be taught and there are great people who shape history.
20.  Beware of Historical biases and inform students to do so. They should study various history books as they are but conclusion must be made as per their own logic.

Thanks for Reading.

(Your suggestions and comments are invited..)

Ambrish Kumar Gupta
Principal
Kendriya Vidyalaya Rajkot
     Date : 10/11/2019

Saturday, October 12, 2019

सभ्यता और संस्कृति: अर्थ एवं विभेद


सभ्यता और संस्कृति: अर्थ एवं विभेद

इतिहास विषय के अध्ययन में “सभ्यता” और “संस्कृति” शब्दों का प्रयोग प्रायः शिक्षार्थी द्वारा सामान अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है. साधारणतया ये दोनों शब्द पर्यायवाची समझे जाते है, परन्तु अर्थ की दृष्टि से इन दोनों में व्यापक अंतर है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव अपनी ऐहिकऔर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहा है और इस निमित्त वह विविध सामाजिक राजनैतिक संस्थाओ तथा आर्थिक यंत्रो व् साधनों का अन्वेषण करतारहा है ताकिइन  आवश्यकताओं की पूर्ति सरलता सुगमता और विश्वसनीय रूपसे हो सके. इस सभी रचनाओं, संस्थाओं और साधनों की संबद्धता और संस्थागत व्यवस्था का ही नाम है- सभ्यता. इस तरह मनुष्य के ऐहिक और भौतिक विकास के साथ-साथ उसकी सभ्यता का भी विकास होता है. किसी निर्दिष्ट सभ्यता का विकास उस समाज विशेष के भौगोलिक वातावरण, ऐतिहासिक अनुभव, शिक्षण व् तकनीकी उन्नयन पर निर्भर करता है.

परन्तु प्रत्येक सभ्यता के क्रमिक विकास में एक स्तर आता है जब वह विशेष नैतिक, मानसिक एवंआध्यात्मिक आदर्शो का निर्माण कर लेता है जो उसके सामूहिक जीवन में इस प्रकार घुल मिल जाते है की समस्त समाज इन उदात्त और सूक्ष्म विशेषताओं में रंग जाता है. इस प्रकार संस्कृति का तात्पर्य विचारों की क्रियाशीलता व् उसके सौन्दर्य तथा मानवता की अनुभूति से होता है. दुसरे शब्दों में, सत्यऔर सौंदर्य की खोज, अभिव्यक्ति और मानव प्रेम का विकास संस्कृति के मूलतत्व है, अर्थात “सत्यं शिवम् सुन्दरम” ही संस्कृति का मूलमंत्र है. निष्कर्षतः सभ्यता के सूक्ष्म, शुद्ध और उदान्त तत्वों के रचनात्मक विकास और पल्लवन का नाम ही संस्कृति है.

सभ्यता के अंतर्गत उन सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिसके माध्यम से कुछ अन्य उद्देश्यों / लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है. सभी भौतिक वस्तुएं यथा- भवन व् उसका स्वरूप, सिक्के, यातायात के साधन आदि इसके अंतर्गत आती है. सभ्यता के अंतर्गत तकनीकी, प्राकृतिक संक्रियाओं के ऊपर मानवीय प्राधिकार और सामजिक नियमन हेतु निर्मित संस्थायें आती हैं जो मानवीय व् सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करती हैं. जबकि संस्कृति के अंतर्गत धर्म, कला, दर्शन, साहित्य, नृत्य और संगीत आदि आते हैं जो मानव को आनंद और संतुष्टि प्रदान करते हैं. इस तरह संस्कृति जीवन की सर्वोच्च दशा को अभिव्यक्त करती है.

सभ्यता वह है जो हम धारण करते हैं और जिसके मापन का निर्धारित मानदंड होता है. इस तरह सभ्यता का सार्वभौमिक मानक है उपयोगिता और इसलिए सभ्यता स्वयं में एक साधन है, जबकि संस्कृति वह है जो हम मूल रूप से हैं संस्कृति के मापन का कोई निर्धारित मानदंड नहीं है क्योकि वह स्वयं एक साध्य है.

सभ्यता को निरंतर प्रगतिशील कहा जा सकता है क्योंकि सभ्यता के तत्वों- भवन. मशीन, यातायात-संचार के साधनों आदि में निरंतर उन्नयन देखा जा सकता है. जबकि संस्कृति को प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता और ना ही आज की कला साहित्य व् दर्शन आदि को पूर्व की तुलना में श्रेष्ट कहा जा सकता है.

सभी मानव समाज की एक सुनिश्चित संस्कृति होती है जबकि कुछ ही मानव समाज की सभ्यता होती है. संस्कृति  एक प्राक-क्रिया है जबकि सभ्यता एक अंतिम क्रिया है. संस्कृति किसी सभ्यता के विकास की पूर्व शर्त है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के विशिष्ट स्तर को प्रतिरूपित करती है. संस्कृति आंतरिक अनुभूति का विषय है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के वाह्यप्रदर्शन और उपयोगिता का विषय है. इस प्रकार संस्कृति जहाँ मानव के विचारों, भावनाओं, संवेगों, आदर्शों और मूल्यों से सम्बंधित है वहीँ सभ्यता व्यक्ति की भौतिक उपलब्धियों की अभिव्यक्ति एवं उसके अस्तित्व का द्योतक है.

इस तरह किसी सभ्यता विशेष का चित्रण आसान होता है, परन्तु संस्कृति विशेष का वास्तविक बोध तथा विवेचन केवल सुहृदय प्रयास, निष्पक्ष अनुसन्धान और सूक्ष्म चिंतन द्वारा ही संभव है. निष्कर्षतः सभ्यता यदि एक देह है तो संस्कृति उसमे अनुप्राणित आत्मा. जैसे देह का वर्णन आसान है परन्तु आत्मा का दिग्दर्शन कराना कठिन है. इसी प्रकार सभ्यता का वर्णन आसानी से  किया जा सकता है जबकि संस्कृति का वर्णन दु:साध्य है. इस तरह संस्कृति केवल अनुसूचित विवरण का विषय नहीं है उसका अध्ययन तो समग्र देह का एक सूक्ष्म सार मात्र ही है. इतिहास विषय का मौलिक उद्देश्य यही अध्ययन है और संस्कृतियों के उदय, विकास और विनाश की खोज ही इतिहास के विद्यार्थियों का श्रेयस्कर कार्य है.

-इति-

लेखन:
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय राजकोट, गुजरात

Tuesday, October 8, 2019

इतिहासअध्ययन सम्बन्धी भ्रांतियाँ और इतिहास का महत्त्व


इतिहास अध्ययन सम्बन्धी भ्रांतियाँ और इसका महत्व
इतिहास अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है, परन्तु सामान्यतः छात्र इसे व्यर्थ और अनुपयोगी विषय मानते है और इसके अध्ययन को गड़े मुर्दे उखाड़ने जैसे कार्य की संज्ञा देते है.  छात्र इतिहास और एतिहासिक घटनाओं के अध्ययन में तिथियों का अत्यधिक महत्त्व मानते है.  इसी तरह छात्रों में इतिहास को अवधारणा आधारित विषय न मानते हुए इसे तथ्यात्मक और रटंत विद्या मानने की प्रवृति पायी जाती है. साथ ही साथ इतिहास को लोग सामान्यतः एतिहासिक घटनाओ का संग्रह ही मानते है. जबकि यह सब इतिहास विषय सम्बन्धी भ्रान्तिया मात्र ही है और इतिहास विषय की प्रकृति और उसके क्षेत्र के बारे में उनकी अज्ञानता इतिहास विषय की रोचकता औरउसके अध्ययन के वास्तविक लाभ से उनको वंचित रखती है.
वास्तव में इतिहास विषय का अध्ययन हमें हमारी प्राचीन उपलब्धियों से अवगत कराता है किभारत पूर्व में विज्ञान और दर्शन की विभिन्न विधाओं में अग्रणी था और उसे विश्व-गुरु का दर्जा प्राप्त था. भारतीय मलमल, सूती रेशमी और ज़री के कपडे और इस्पाती तलवारों की मांग सम्पूर्ण विश्व में थी तथा विदेशी निर्यात से आने वाले अकूत धन के कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. इस तरह हमारे गौरवपूर्ण अतीत का अध्ययन हमें सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. यह हमें प्रेरित करता है की यदि अतीत में भारत विश्व का पथ-प्रदर्शक बन पाया था तो आज के विश्व में यह सकारात्मक भूमिकानहीं निभा पायेगा, इसका कोई कारण नहीं है. विष्णु पुराण में भारत भूमि की गौरव-गाथा एवं उसके विस्तार का वर्णन मिलता है. जिससे राष्ट्रके नागरिकों में. सह-अस्तित्व, विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होता है.
इतिहास का अध्ययन न सिर्फ अतीत में हमारी रूचि जागृत करता है वरन ज्ञान का श्रोत भी उपलब्ध कराता है. यह हमें अपनी सीमाओं की रक्षा की अनदेखी के खतरों से आगाह कराता है. ये हमें बताता है की वे मूर्खतायें नहीं करनी चाहिए, जिनके दुष्परिणामों को हम अतीत में भुगत चुके है. इस प्रकार इतिहास हमारा मार्गदर्शन करता है और आज का समाज अतीत के अनुभवों से व्यापक लाभ उठा सकता है.
इतिहास को एक अध्ययन के विषय के रूप में समस्त विषयों की जननी कहा जाता है. जहां अन्य विषयों के अध्ययन के आरम्भ का काल सुनिश्चित किया जा सकता है, वहीं इतिहास का अध्ययन शिक्षा के आरंभिक काल से ही हो रहा है तथा अन्य विषय इतिहास से ही उदभूत है. इतिहास के अध्ययन से हमें. अनेक आधुनिक भाषाओं और लिपियों के विकास की जानकारी मिलती है. इतिहास के क्रमागत अध्ययन से ही स्पष्ट है कि प्रायः सभी उत्तर भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुयी है.
इतिहास मानविकी विषय का अंग होने के कारणव्यक्ति में मानवीय और सामाजिक गुणों का विकास करता है तथा व्यक्ति का समाज और वाह्य संसार से तादात्म्य एवं समायोजन करता है. इतिहास के अध्ययन से हमें उन शक्तियों कापता चलता है जिन्होंने भारतीय समाज को एक सांचे में ढ़ालकर आज की स्थिति में पहुँचाया और इससे हमेंअपने वर्तमान को समझने और भविष्य को संवारने के लिए भी मार्गदर्शन प्राप्त होता है.
इतिहास के अध्ययन से हमें नैतिक शिक्षा भी मिलती है. विभिन्न एतिहासिक ग्रंथो में वर्णित घटनाओं से स्पष्ट होता है की  शासक जब अधर्म के पथ पर चलते है तो उनका विनाश होता है और अंततः धर्म की विजय होती है. महाकाव्यों, वेदों और वेदांगो में वर्णित सूक्ति-वाक्य हमेंसदैव प्रेरणा, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन देते है ताकि हम सदैव न्याय का अनुशरण कर सकें.
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण इतिहास का अध्ययन इसका रोजगारपरक होना है. इतिहास का अध्ययन हमारे सामान्य ज्ञान को संवर्धित करता है. इससे जहाँ हम रोजगारपरक प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सरकारी व् गैर-सरकारी सेवाओं में जा सकते है वहीं अंतर्राष्ट्रीय संबंधो के निर्धारण में भी इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बिना एतिहासिक ज्ञान के वैदेशिक संबंधो का संचालन सुगमता से नहीं किया जा सकता. एक विदेश सेवा के अधिकारी के लिए इतिहास विषय का ज्ञान अपरिहार्य है बिना इसके  राष्ट्र की विदेश नीति सफल नहीं हो सकती. इतिहास का ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण और उसका परिष्कार करता है. इतिहास के ज्ञानार्जन से जहाँ सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है वहीँ विभिन्न प्रश्नोत्तरी आधारित कार्यक्रमों जैसे- कौन बनेगा करोड़पति आदि में शामिल होकर या प्रतिभागियों का सहयोग कर धनार्जन और यश की प्राप्ति की जा सकती है.
लेखन:
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय राजकोट, गुजरात