इतिहास लेखन का भारतीय दृष्टिकोण
इतिहास हमेशा ही विजेताओ द्वारा लिखा जाता है.क्योकि वे ही कुछ
विशिष्ट और असामान्य करते है जिसको रिकार्ड करने की जरुरत होती है, ये इसलिए भी
जरुरी होता है ताकि विजेता अपने प्रयासों को सही ठहरा सकें, अन्यथा सामान्य घटनाओ के
लेखन की क्या आवश्यकता है. अतः राजनितिक आवश्यकताओं के कारण ही इतिहास का एक
विशिष्ट विषय के रूप में लेखन शुरू हुआ माना जाता है.
राजनीति असमानता पर आधारित होती है तथा इसी से वह पल्लवित और पुष्पित
होती है अतः राजनीति लोक और राष्ट्र को जोडती कम तोडती ज्यादा है जबकि समाज अर्थ
और संस्कृति इनको जोडने का कार्य करती है, भारत और भारतीय मनीषी सदैव समावेशी
विचारों से प्रेरित रहे है इसलिये भारत में इतिहास लेखन का दृष्टिकोण हमेशा गैर
राजनैतिक रहा है तथा इसके लेखन में. सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों को ही प्रमुखता दी गयी है. ताकि आने वाली पीढ़ियों
को सत्य-असत्य और धर्म-अधर्म का ज्ञान दिया जा सके और लोगो को अंततः सन्मार्ग की
ओर प्रेरित किया जा सके. इस दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास लेखन की प्रकृति हमेशा
समावेशी और मार्गदर्शी रही है तथा इसको अलग से लिखने का प्रयास कभी भी नहीं किया
गया है. भारतीय वेद और पुराण इसके उदाहरण हैं. जहाँ वेद विश्व के प्राचीनतम
ज्ञानकोष है वही पुराण प्राचीन आख्यान, जो मूलतः शैक्षिक उद्देश्यों से ही लिखे गए
थे. अतः इसमें निरंतरता और क्रम्बध्धता के बजाय नैतिकता सामाजिक और सांस्कृतिक
मूल्यों पर अत्यधिक बल दिया गया है.
भारत की एक राष्ट्र के रूप में अभिव्यक्ति प्राचीनकाल से ही रही है
जिसकी भौगोलिक सीमा के बारे में स्पष्ट उल्लेख विष्णु पुराण में मिलता है. इस समय यातायात
और संचार के साधन अत्यन्त सीमित और नगण्य थे और यह राजनितिक रूप से एकीकृत भी नहीं
था, तथापि भारत एक राष्ट्र के रूप में प्राचीन काल से ही विदित रहा है तो इसका एकमात्र
कारण भारत की सांस्कृतिक एकता ही रही है. अतः भारतीय ग्रंथो का आधार सदैव से सांस्कृतिक
रहा है जिसमे राजनितिक घटनाओ का भी यत्र-तत्र विवरण मिलता है. इसका यह कतई अर्थ
नहीं लगाया जाना चाहिए कि भारतीयों में एतिहासिक दृष्टिकोण का अभाव रहा है बल्कि
इसका तात्पर्य यह है की भारतीय मनीषी राजनीति से ज्यादा मानव और समाज के
सांस्कृतिक और नैतिक पहलू पर ज्यादा जोर देते थे और उनका दृष्टिकोण सदैव एक आदर्श लोककल्यान्कारी राज्य की स्थापना और बंधुत्व के
विचारों से प्रेरित रहा है. इसी कारण भारतीय इतिहास अनेक श्रेष्ठ राजाओं यथा सत्यवादी
राजा हरिश्चंद्र, दानवीर हर्षवर्धन, महाराजा विक्रमादित्य आदि आदर्शों और
राम-राज्य जैसी अवधारणाओं से परिपूर्ण है.
भारतीय समाज सदा से समावेशी रहा है अतः उसकी शिक्षा प्रणाली भी समावेशी
और एकीकृत रही है जिसमे अंतरविषयी ज्ञान को महत्त्व दिया गया था. गुरुकुल प्रणाली
सर्व समवेशिक प्रणाली का सर्वोत्तम उदहारण है. जैसे जैसे लोगो ने विशिष्टीकरण की
ओर ध्यान दिया और ज्ञान को विभिन्न शाखाओं में बाँटना शुरू किया, प्राचीन शिक्षा
प्रणाली की एकीकृत और समावेशी सोच का स्थान तर्क और बुध्ही आधारित नव गैर भारतीय
शिक्षा प्रणालियों नेलेना शुरू किया, जिसमे घटना के पीछे के तथ्य और निहितार्थ
खोजे जाने लगे और घटनाओं के पीछे के प्रेरक मानवीय मूल्य तथा इससे सम्बध्ह भावनाए
गौड़ होने लगी. आदर्शवाद की जगह व्यक्तिवाद और संसारिकता प्रभावी होने लगी. शिक्षा
और शिक्षा-प्रणाली व्यव्सयिक होने लगी तथा विषय और उनके अध्ययन के उद्देश्य बदल
गए. इतिहास लेखन भी इससे अछूता नहीं रहा.
प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन के विपरीत अब प्रशस्तिया और इतिवृत्त
लिखे जाने लगे. जो कार्य पहले मनीषियों द्वारा समाज के उद्देश्य से स्वत: किया
जाता था वही कार्य अब दरबारी चाटुकारों
द्वारा निहित स्वार्थ के कारण कारण किया और करवाया जाने लगा. मध्यकालीन अरब और
ईरानी लेखकों ने इसी को वास्तविक इतिहास की संज्ञा दी और औपनिवेशिक विद्वानों ने
श्रेष्ठता की नस्लीय विचारधारा से प्रेरित होकर तथा अपने औपनिवेशिक शासन का औचित्य
शिद्ध करने के लिए भारत को एक बहुराष्ट्रीयता वाले देश के रूप में देखना शुरू किया
जो अपनी अक्षमता और अज्ञानता के कारण सदियों से विदेशियों का गुलाम रहा है. इन
इतिहासकारों ने सदियों से भारतीयों में
एतिहासिक समझ न होने का प्रपंच रचा, जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी वैचरिक सोच
के कारण सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया जिसमे वो अधिकतर सफल भी रहे. चूँकि
वामपंथियों के आदर्श मार्क्स और लेनिन जैसे विदेशी थे जो औद्योगीकारण की बुराइयो
के कारण अस्तित्व में आये थे इसलिए
उन्होंने भारत को भी विदेशियों के चश्में से देखा और प्रत्येक घटना के पीछे सिर्फ
अर्थ और आर्थिक शोषण को ही जिम्मेदार माना. इन इतिहासकारों ने भारत की सभी वर्तमान बुराइयो के लिए भारतीय
संस्कृति को दोषी ठहराया और चिकित्सा, ज्ञान-विज्ञान आदि के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय
समृद्ध विरासत को न सिर्फ नकारा वरन इसे हेय दृष्टि से देखा और इसको कपोल कल्पित और
अवैज्ञानिक बताकर जान बुझकर लोगो के ध्यान
से दूर रखा, फलतः भारतीयों में हीनता की भावना भरने लगी और वे अपनी सामुदायिक
समावेशी संस्कृति और एकीकृत राष्ट्र की अवधारणा से दूर होते गए. उनमे आत्म सम्मान
और राष्ट्र चेतना का भाव समाप्त होने लगा.
पराधीनता की इस स्थिति को स्वतंत्रता के बाद भी राजनितिक हितो के
कारण बनाये रखा गया है और हम आज भी मैकाले की शिक्षा पद्धति के द्वारा लोगो को मानसिक
व् शारीरिक गुलामी करने के लिए तैयार कर
रहे है जिनमे स्वावलंबन और आत्म-निर्भरता का अभाव है और वो खुद को सिर्फ नौकरियों
के लिए ही तैयार कर रहे हैं. आज की शिक्षा प्रणाली हमें तार्किक और बुद्धिमान तो
बना रही है पर ये हमें सामाजिकता मानवीयता परमार्थ और विश्व कल्याण के मार्ग से
दूर भी कर रही है. ग्रामीण क्षेत्रों का अनपढ़ व्यक्ति शहरों के पढ़े लिखे वर्ग से
ज्यादा संतोषी, सामजिक और दूसरों के सुख दुःख में काम आने वाला होता है. कहने का
तात्पर्य है की आज की शिक्षा प्रणाली हमें नितांत व्यक्तिगत और स्वकेंद्रित बना
रही है. आज की शिक्षा हमें जीवन यापन के लिए तो तैयार कर रही है पर यह व्यक्ति के
अंत: और वाह्य व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित कर पाने में असमर्थ है.
अतः आज समग्र समावेशी अंतरविषयी प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को पुनः अपनाने की आवश्यकता
है जो बुध्धि ज्ञान कौशल सबका समुचित विकास करती है न कि पश्चिमी शिक्षा प्रणाली का अन्धानुकरण करने
की. उम्मीद है कि देश की नई शिक्षा नीति शिक्षा के वास्तविक मर्म को समझते हुए,
भारत की पारम्परिक शिक्षा प्रणालियों और उसकी विरासत को समेटे हुए होगी जिसमें
पारम्परिकता के साथ आधुनिकता का भी तालमेल होगा और जो राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ भारतीयों के नैतिक बल को भी प्रोत्साहित करेगी.
सधन्यवाद.
लेखन :
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य
केंद्रीय विद्यालय राजकोट

बहुत अच्छा लिखा है सर।
ReplyDeleteIndepth analysis..... Keep it up sir
ReplyDeleteRelevant and appropriate..sir Ji
ReplyDeleteVery deep routed knowledge you have delivered sir... congrats from Dr. Rakesh A.Joshi
ReplyDeleteGrt work sirj. Lokesh meena kv baroda
ReplyDeleteVery well framed critical analysis on Indian style of writing History.
ReplyDeleteWaiting for next
सच कहूँ तो यह ब्लाॕग मैने तीन बार पढा़... जितनी बार पढूँ हर बार कुछ न कुछ नया मर्म समझ में आता हैं. हमारा अतीत जो हमसे कभी अलग नही हो सकता इसके बारें में इस ब्लाॕग के द्वारा आपने बहूत सारी नई व्याख्याएँ और दृष्टीकोण उजागर करणे की सफलतापूर्वक कोशीश की हैं. आप ऐसा लिखने का कार्य जारी रखे और हमें इसके द्वारा हर बार कुछ नया ज्ञान मिले. यही आशा है...
ReplyDeleteबहुत सुंदर विश्लेषण किया है सर आपने
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