सभ्यता
और संस्कृति: अर्थ एवं विभेद
इतिहास विषय के अध्ययन में “सभ्यता” और “संस्कृति” शब्दों का प्रयोग
प्रायः शिक्षार्थी द्वारा सामान अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है. साधारणतया ये
दोनों शब्द पर्यायवाची समझे जाते है, परन्तु अर्थ की दृष्टि से इन दोनों में
व्यापक अंतर है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव अपनी ऐहिकऔर भौतिक आवश्यकताओं की
पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहा है और इस निमित्त वह विविध सामाजिक राजनैतिक संस्थाओ
तथा आर्थिक यंत्रो व् साधनों का अन्वेषण करतारहा है ताकिइन आवश्यकताओं की पूर्ति सरलता सुगमता और
विश्वसनीय रूपसे हो सके. इस सभी रचनाओं, संस्थाओं और साधनों की संबद्धता और
संस्थागत व्यवस्था का ही नाम है- सभ्यता. इस तरह मनुष्य के ऐहिक और भौतिक विकास के
साथ-साथ उसकी सभ्यता का भी विकास होता है. किसी निर्दिष्ट सभ्यता का विकास उस समाज
विशेष के भौगोलिक वातावरण, ऐतिहासिक अनुभव, शिक्षण व् तकनीकी उन्नयन पर निर्भर
करता है.
परन्तु प्रत्येक सभ्यता के क्रमिक विकास में एक स्तर आता है जब वह
विशेष नैतिक, मानसिक एवंआध्यात्मिक आदर्शो का निर्माण कर लेता है जो उसके सामूहिक
जीवन में इस प्रकार घुल मिल जाते है की समस्त समाज इन उदात्त और सूक्ष्म विशेषताओं
में रंग जाता है. इस प्रकार संस्कृति का तात्पर्य विचारों की क्रियाशीलता व् उसके
सौन्दर्य तथा मानवता की अनुभूति से होता है. दुसरे शब्दों में, सत्यऔर सौंदर्य की
खोज, अभिव्यक्ति और मानव प्रेम का विकास संस्कृति के मूलतत्व है, अर्थात “सत्यं
शिवम् सुन्दरम” ही संस्कृति का मूलमंत्र है. निष्कर्षतः सभ्यता के सूक्ष्म, शुद्ध
और उदान्त तत्वों के रचनात्मक विकास और पल्लवन का नाम ही संस्कृति है.
सभ्यता के अंतर्गत उन सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है जिसके
माध्यम से कुछ अन्य उद्देश्यों / लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है. सभी भौतिक
वस्तुएं यथा- भवन व् उसका स्वरूप, सिक्के, यातायात के साधन आदि इसके अंतर्गत आती
है. सभ्यता के अंतर्गत तकनीकी, प्राकृतिक संक्रियाओं के ऊपर मानवीय प्राधिकार और
सामजिक नियमन हेतु निर्मित संस्थायें आती हैं जो मानवीय व् सामाजिक व्यवहार को
नियंत्रित करती हैं. जबकि संस्कृति के अंतर्गत धर्म, कला, दर्शन, साहित्य, नृत्य
और संगीत आदि आते हैं जो मानव को आनंद और संतुष्टि प्रदान करते हैं. इस तरह
संस्कृति जीवन की सर्वोच्च दशा को अभिव्यक्त करती है.
सभ्यता वह है जो हम धारण करते हैं और जिसके मापन का निर्धारित मानदंड
होता है. इस तरह सभ्यता का सार्वभौमिक मानक है उपयोगिता और इसलिए सभ्यता स्वयं में
एक साधन है, जबकि संस्कृति वह है जो हम मूल रूप से हैं संस्कृति के मापन का कोई
निर्धारित मानदंड नहीं है क्योकि वह स्वयं एक साध्य है.
सभ्यता को निरंतर प्रगतिशील कहा जा सकता है क्योंकि सभ्यता के तत्वों-
भवन. मशीन, यातायात-संचार के साधनों आदि में निरंतर उन्नयन देखा जा सकता है. जबकि
संस्कृति को प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता और ना ही आज की कला साहित्य व् दर्शन आदि
को पूर्व की तुलना में श्रेष्ट कहा जा सकता है.
सभी मानव समाज की एक सुनिश्चित संस्कृति होती है जबकि कुछ ही मानव
समाज की सभ्यता होती है. संस्कृति एक प्राक-क्रिया
है जबकि सभ्यता एक अंतिम क्रिया है. संस्कृति किसी सभ्यता के विकास की पूर्व शर्त
है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के विशिष्ट स्तर को प्रतिरूपित करती है. संस्कृति
आंतरिक अनुभूति का विषय है जबकि सभ्यता किसी संस्कृति के वाह्यप्रदर्शन और
उपयोगिता का विषय है. इस प्रकार संस्कृति जहाँ मानव के विचारों, भावनाओं, संवेगों,
आदर्शों और मूल्यों से सम्बंधित है वहीँ सभ्यता व्यक्ति की भौतिक उपलब्धियों की
अभिव्यक्ति एवं उसके अस्तित्व का द्योतक है.
इस तरह किसी सभ्यता विशेष का चित्रण आसान होता है, परन्तु संस्कृति
विशेष का वास्तविक बोध तथा विवेचन केवल सुहृदय प्रयास, निष्पक्ष अनुसन्धान और
सूक्ष्म चिंतन द्वारा ही संभव है. निष्कर्षतः सभ्यता यदि एक देह है तो संस्कृति
उसमे अनुप्राणित आत्मा. जैसे देह का वर्णन आसान है परन्तु आत्मा का दिग्दर्शन
कराना कठिन है. इसी प्रकार सभ्यता का वर्णन आसानी से किया जा सकता है जबकि संस्कृति का वर्णन दु:साध्य
है. इस तरह संस्कृति केवल अनुसूचित विवरण का विषय नहीं है उसका अध्ययन तो समग्र
देह का एक सूक्ष्म सार मात्र ही है. इतिहास विषय का मौलिक उद्देश्य यही अध्ययन है
और संस्कृतियों के उदय, विकास और विनाश की खोज ही इतिहास के विद्यार्थियों का
श्रेयस्कर कार्य है.
-इति-
लेखन:
अम्बरीश कुमार गुप्ता
प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय राजकोट, गुजरात

Lokesh meena....grt effort sir
ReplyDeleteसटीक और सारगर्भित लेख।
ReplyDeleteGreat job sir
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर एवम उपयोगी लेख है सर।
ReplyDeleteWow!great post sir ji...
ReplyDeleteसारगर्भित व्याख्या। अति उपयोगी और सम्प्रेषणीय। धन्यवाद सर।
ReplyDeleteसर आपका लेख बहुत ही ज्यादा ज्ञानवर्धक एवम रौचक है।
ReplyDeleteReally informative
ReplyDeleteबहुत ही सारगर्भित लेख है। धन्यवाद सर, उपयोगी जानकारी के लिए।
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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